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निर्णय का सामान्य सारांश 

सर्वोच्च न्यायलय ने प्रशांत भूषण के दो ट्वीट्स पर स्वत: संज्ञान लिया : एक, ट्ववीट वह था जिसमें उन्होंने पिछले छह वर्षों से भारत के लोकतंत्र के 'विनाश' में सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका को भी जिम्मेदार ठहराया, जबकि दूसरा भारत के मुख्य न्यायाधीश पर था, इस ट्वीट के साथ मुख्य न्यायधीश बोबडे की मोटरसाइकिल पर बैठे एक तस्वीर थी। न्यायालय ने आपराधिक अवमानना ​​की कार्यवाही शुरू की। 14 अगस्त को न्यायलय ने भूषण को आपराधिक अवमानना ​​का दोषी ठहराया। करीब दो हफ्ते बाद, 31 अगस्त को न्यायलय ने भूषण पर 1 रुपये का जुर्माना लगाया। जिसका भुगतान 15 सितंबर 2020 से पहले करना होगा। इसके अलावा, इस जुर्माने को न देने की स्थिति में भूषण को तीन महीने की कैद और तीन साल के लिए वकालत करने से वंचित किया जाएगा। यह फैसले का एक सामान्य हिन्दी सारांश है।

 

सत्य की रक्षा के आधार  का बचाव नहीं इस्तेमाल कर सकते  भूषण

कार्यवाही के दौरान, भूषण ने दावा किया कि उन्हें आपराधिक अवमानना ​​के लिए दंडित नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि उनके ट्वीट्स की सामग्री 'सत्य' थी: अवमानना ​​के लिए सत्य एक वैधानिक अपवाद है। फैसले के पहले भाग में न्यायलय ने इस दावे की बारीकी से जांच की।

 

न्यायालयों की अवमानना ​​अधिनियम, 1971 की धारा 13 अवमानना ​​के बचाव के तौर पर “सत्य” को प्रस्तुत करने की छूट देती है। हालाँकि, इसके लिए दो शर्तों को पूरा करने की आवश्यकता होती है: क) बयान जनहित में होना चाहिए, ख) यह वास्तविक होना चाहिए, यानी, उचित विश्वास के साथ। बचाव पक्ष इसका प्रयोग करे उससे पहले न्यायालय को इन दोनों शर्तों के बारे में आश्वस्त होना चाहिए। इनडायरेक्ट टैक्स प्रैक्टिशनर्स एसोसिएशन बनाम आर.के. जैन केस के अनुसार, न्यायालय ने इस बात पर प्रकाश डाला कि 'सत्य को आमतौर पर बचाव के रूप में अनुमति दी जानी चाहिए जब तक कि न्यायालय यह नहीं पाता कि यह अदालत को बदनाम करने के जानबूझकर या दुर्भावनापूर्ण प्रयास के परिणामों से बचने के लिए केवल एक छलावरण है या न्याय के प्रशासन में हस्तक्षेप है।'

 

हालाँकि ट्वीट छोटे थे और दो दावे किए, न्यायलय ने कहा कि हलफनामे में, भूषण ने न्यायालय के न्याय से संबंधित 'आरोपों की एक श्रृंखला' का उल्लेख किया। यदि इन दावों पर विचार किया जाना था, तो न्यायालय का मानना ​​​​था कि यह 'अवमानना ​​की वृद्धि के अलावा और कुछ नहीं होगा'। बचाव के रूप में भूषण के सत्य के दावे को 'सच्चाई' या 'सद्भावना' के रूप में नहीं माना जा सकता है। इसके बजाय, उनका बचाव 'इस न्यायालय की प्रतिष्ठा के लिए अधिक अपमानजनक है। यह और अधिक न्याय के प्रशासन को बदनाम करने के लिए होगा, जिसमें इस देश के आम नागरिक को विश्वास है और न्याय पाने के लिए अंतिम उपाय के रूप में इस न्यायालय से जुड़ता है। भूषण के 'लापरवाह आरोप' राजनीति से प्रेरित थे और उनमें 'न्यायिक प्रशासन की पूरी इमारत को हिला देने और न्याय प्रशासन में आम आदमी के विश्वास को झकझोरने' की क्षमता थी।

 

क्या भूषण के ट्वीट भाषण की स्वतंत्रता के तहत सुरक्षित हैं?

जबकि अनुच्छेद 19 (1) (ए) भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार की गारंटी देता है, अनुच्छेद 19 (2) इस स्वतंत्रता के प्रतिबंध के रूप में 'अदालत की अवमानना' को संहिताबद्ध करता है। यदि बोलने की स्वतंत्रता का परिणाम न्यायालय और/या न्यायालय के लोगों को 'निंदा' करना है, तो 19 (1) (ए) के तहत संवैधानिक संरक्षण कायम नहीं रहेगा।

 

न्यायालय और न्यायाधीशों के लिए, स्थिति अद्वितीय है। परंपरागत रूप से, न्यायाधीश 'सार्वजनिक रूप से अपनी राय व्यक्त नहीं कर सकते; सार्वजनिक बहस में शामिल हुए बिना न्यायाधीश अपने निर्णयों को अपनी अभिव्यक्ति के रूप में उपयोग करते हैं। जब मीडिया में न्यायाधीशों पर आरोप लगाए जाते हैं, तो न्यायाधीश परंपरा से विवश होते हैं और जवाब नहीं दे सकते। इसलिए बार को न्यायपालिका की रक्षा का  'प्रवक्ता' होना चाहिए।

 

अनुच्छेद 19 (1) (ए) अदालत की 'निष्पक्ष आलोचना' की रक्षा करता है जो 'प्रामाणिक और स्वीकार्य सामग्री' में निहित है। यदि भाषण 'न्यायाधीश की ईमानदारी, क्षमता और निष्पक्षता' के बारे में आशंका पैदा करता है तो यह अदालत की अवमानना ​​है। न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि भूषण के ट्वीट्स ने 'निष्पक्ष आलोचना' की परीक्षा पास नहीं की और अदालत की अवमानना ​​​​की। इसके अतिरिक्त, 35 वर्षों के अनुभव वाले अधिवक्ता के रूप में, न्यायालय के अधिकारी के रूप में भूषण के लिए यह मानक ऊँचा होगा।

 

चल  रहे न्यायिक मामलों के बारे में मीडिया में बयान

न्यायालय ने दो प्रश्न पूछे: क) क्या न्यायालय को मीडिया में प्रकाशित बयानों से प्रभावित होना चाहिए? ख) एक विचाराधीन मामले पर बयान दिया जा सकता है? इन दोनों सवालों का नकारात्मक जवाब देते हुए, न्यायलय ने कहा कि जब वह अपने न्यायिक कार्यों का प्रयोग कर रहा है, तो वह जनता की राय या मीडिया रिपोर्टों को अपने फैसले को प्रभावित करने की अनुमति नहीं दे सकता है। न्यायलय ने कई केस कानूनों पर भरोसा किया जिनमें आर.के. आनंद बनाम रजिस्ट्रार, दिल्ली उच्च न्यायालय, और रिलायंस पेट्रोकेमिकल्स लिमिटेड बनाम इंडियन एक्सप्रेस न्यूज-पेपर्स बॉम्बे प्राइवेट लिमिटेड के मालिक और अन्य, जिनमें कोर्ट  का मानना ​​है कि न्याय का प्रशासन 'अप्रभावित' होना चाहिए और 'न्यायिक निर्णय को सार्वजनिक आंदोलन या प्रकाशनों द्वारा पूर्व-निर्धारित या बाधित नहीं किया जाना चाहिए'।

 

भूषण ने सुनवाई से पहले मीडिया को अपना बयान जारी किया। एक विचाराधीन मामले में, इस तरह के बयान को जारी करना, जो उसने न्यायालय में दिया था, 'अनुचित कार्य' होगा और 'समाचार पत्र और मीडिया के प्रभाव से न्यायालय के फैसले को मजबूर करने का प्रयास' है ...' 

 

सजा

यह निष्कर्ष निकालने के बाद कि भूषण द्वारा 'सत्य' का बचाव के रूप में आह्वान जनहित और सद्भाव में होने के परीक्षणों में विफल रहा, अदालत ने कहा कि उन्हें उचित दंड देना होगा। इसके अलावा, भूषण ने कई संकेतों के बाद अदालत से माफी मांगने से इनकार कर दिया, यह प्रदर्शित करते हुए कि वह अपने तर्क पर सही हैं  और उन्हें  कोई पछतावा नहीं है। 

 

अटॉर्नी-जनरल की इस दलील को ध्यान में रखते हुए कि अदालत को 'उदारता' और 'नेतृत्व' का प्रदर्शन करना चाहिए और यह कि अदालत शुरू से ही 'इस मामले को शांत करने की इच्छुक थी', भूषण पर 1 रुपये का जुर्माना लगाया गया है। उन्हें इसे 15 सितंबर 2020 तक कोर्ट रजिस्ट्री में जमा करना आवश्यक है, ऐसा न करने पर उसे तीन महीने की जेल होगी और तीन साल के लिए सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस करने से भी रोक दिया जाएगा।

 

This piece is translated by Kundan Kumar Chaudhary & Rajesh Ranjan from Constitution Connect