आज अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षित गर्भपात, एवं गर्भपात के गैर अपराधीकरण (अपराध की श्रेणी से बाहर करना)के लिए एक अंतरराष्ट्रीय दिन है। कई अध्ययनों ने गैर अपराधीकरण के महिला स्वास्थ्य पर सकारात्मक(अच्छे)प्रभाव को साबित किया है:यह उन्हें एक सुरक्षित एवं स्वस्थ वातावरण में गर्भपात की अनुमति देता है, साथ ही अपने स्वास्थ्य के बारे में बेहतर निर्णय लेने के अवसर भी देता है। इस लिहाज से महिलाओं के उत्तम स्वास्थ्य परिणाम एवं सुधार के लिए गैर अपराधीकरण पहला कदम है; जबकि गर्भपात के मुश्किलों में राहत व्यापक तौर पर दूसरा कदम माना जाता है। 29 अप्रैल 2019 को तीन महिलाओं ने सुप्रीम कोर्ट (सर्वोच्च न्यायालय)में गर्भपात चिकित्सीय निवारण(समापन)कानून(1971)की धारा तीन(3)और पांच(5)की वैधानिकता को चुनौती देते हुए जनहित याचिका दायर किया। ये धाराएं महिलाओं को बहुत ही सीमित परिस्थितियों में गर्भपात करने की अनुमति देता है - जैसे की - माँ के मानसिक या शारीरिक स्वास्थ्य को खतरा, या गर्भ का समान नहीं होना,केवल तब ही जब कम से कम एक डॉक्टर उसकी सहमति दे।

 

दुनियाँ के कई सारे क्षेत्राधिकारों(देशों)में महिलाओं के गर्भपात के अधिकार को सैद्धांतिक तौर पर माना है लेकिन आमतौर पर यह अधिकार काफी प्रतिबंधित होते हैं।

 

जैसे की अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट रो बनाम वेड के केस में महिलाओं के गर्भपात के अधिकार को पहले तीन माह  में असीमित माना:हालांकि दूसरे और तीसरे तिमाही में माँ के स्वास्थ्य के सुरक्षा के लिए रोक  लगाए जा सकते हैं। बाद में प्लांड पेरेंटहुड बनाम केसी के केस में कोर्ट ने थोड़ा परिवर्तन करते हुए यह कहा की हर राज्य गर्भपात पर उस समय से प्रतिबन्ध लगा सकता है, तब जब गर्भ में जीवन आ जाय।

 

कुछ कानून निर्माताओं ने यह तर्क किया है की ज्यों ही बच्चें के ह्रदय में गति आ जाती है या धड़कने लगती है उस समय से ही गर्भ में जीवन आ जाता है: परिणाम यह हुआ की अलबामा जैसे राज्य ऐसे कानून पास करने में सफल हुए हैं जो महिलाओं को छह(6)सप्ताह बाद गर्भपात करने से रोकता है, जब बच्चे का ह्रदय पहली बार धड़कना शुरू करता है।

 

अमरीकी केसेस का मुख्य निष्कर्ष माँ की व्यक्तिगत स्वतंत्रता/स्वायत्तता से गर्भ के अधिकार के तरफ से  ध्यान हटाना है, जो राज्य को गर्भपात की पहुंच पर कठिन रोक लगाने की अनुमति देता है। इसलिये  गर्भपात के अधिकार को मौलिक या जरुरी अधिकार नहीं माना गया कुछ सीमित परिस्थितियों को छोड़कर जैसे वलात्कार या अनाचार।

 

यह सिर्फ संयुक्त राज्य अमेरिका तक ही अकेले सीमित नहीं है, यहां तक की प्रगतिशील न्यायालयों जैसे की यूरोपियन कोर्ट ऑफ़ ह्यूमन राइट ने भी गर्भपात को पूर्ण अधिकार के तौर पर मानने से मना कर दिया। जिससे जो मजबूत मानव अधिकार यूरोपियन यूनियन के सदस्य राज्यों के निवासियों को मिला हुआ है उसका विस्तार गर्भपात के अधिकार तक नहीं हो पाया।

 

जैसे की हाल ही में आयरलैंड ने गर्भपात का अपराधीकरण कर दिया है अगर महिला अपने जीवन के खोने के परिस्थिति में नहीं हो तो। गर्भ निवारण एवं नियंत्रण अधिनियम 2018 पहले तिमाही में महिलाओं को अनुमति पर गर्भपात करने का अधिकार देता है। यह कानून तब पास हुआ जब लोगों ने आठवें संविधान संशोधन(जो कहता है की राज्य अजन्मे बच्चों के जीवन के अधिकार को मानता है एवं इसे बचाएगा) को निरस्त करने के जनमत संग्रह पर मतदान किया।

 

गर्भपात के अधिकार पर यूरोप और अमेरिका में वैश्विक विमर्श प्रभावी धार्मिक समूहों द्वारा बनाया जाता है जो गर्भपात को औरतों के शारीरिक स्वतंत्रता और निजता के अधिकार की जगह पर गर्भ के जीवन की शुद्धता और जीवन अधिकार की नजर से देखते हैं। गर्भपात का मजबूत सामाजिक एवं सांस्कृतिक विरोध की वजह से ही संयुक्त राष्ट्र संघ मानवाधिकार समिति जैसे संस्थाएं भी अनुमति पर गर्भपात तक की पहुँच के अधिकार को समर्थन करने से पीछे हटती है।

 

दिलचस्प तौर पर गर्भपात पर भारत में विमर्श गर्भ के अधिकार पर नहीं बल्कि गर्भनिरोधकों एवं विवाह पूर्व शारीरिक सम्बन्ध के प्रति सामाजिक दृष्टिकोणों के इर्द-गिर्द है। हाल ही में गर्भपात चिकित्सीय निवारण(समापन)कानून(1971 ) में किये गए संशोधन अविवाहित औरतों को भी गर्भपात का अधिकार देता है अगर गर्भावस्था ,गर्भनिरोध के असफल होने के कारण हुआ हो- एक अधिकार जो पहले सिर्फ विवाहित महिलाओं तक सीमित था । क्या यह सुप्रीम कोर्ट को गर्भपात को मौलिक अधिकार के तौर पर मानने के लिए प्रेरित करेगा ?

 

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(Translated by Rajesh Ranjan from Socio Legal Literary.)