English

अभिनव रामकृष्ण बनाम भारत संघ में सुप्रीम कोर्ट में एक रिट याचिका दायर की गई है, जिसमें अनाथों को 'पिछड़े वर्ग' के रूप में पहचाने जाने की मांग की गई है। ऐसी स्थिति सरकारों को भारतीय संविधान, 1950 के अनुच्छेद 15(4) और 16(4) के तहत सकारात्मक प्रयास के प्रावधान करने की अनुमति देगी।  इसमें उच्च शिक्षा और सार्वजनिक रोजगार में आरक्षण जैसे प्रावधान शामिल करना  है | याचिका में अनाथों के कल्याण के लिए एक समान नीति/कानून की भी मांग की गई है। याचिका 2016 में राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (एनसीबीसी) के एक प्रस्ताव पर आधारित है। एनसीबीसी ने सिफारिश की थी कि जो बच्चे 10 साल की उम्र से पहले अनाथ हो गए थे, और अगर उन्हें गोद नहीं लिया गया है तो ,उन्हें अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) में शामिल किया जाना चाहिए। 

 

संविधान के तहत 'पिछड़ापन': जाति से आगे बढ़ रहे हैं?

एम.आर. बालाजी बनाम  स्टेट ऑफ मैसूर (1962) में, न्यायालय ने माना कि जाति पिछड़ेपन का निर्धारण करने में एक महत्वपूर्ण कारक होगी। हालांकि, इसे अन्य शैक्षिक और आर्थिक कारकों के साथ विचार किया जाना था। कुछ बदलावों के साथ, पिछड़ापन का पैमाना कई  वर्षों से  एक जैसा बना हुआ है। के.सी. वसंत कुमार बनाम  कर्नाटक राज्य (1985) में, जाति को अभी भी प्रासंगिक पाते हुए, न्यायालय ने आर्थिक कारकों को भी महत्वपूर्ण पाया।

 

अधिकांश राज्यों में, लगभग 50% सीटें जाति आधारित समूहों के लिए आरक्षित हैं, जो पिछड़ेपन को पहचानने का सबसे सामान्य आधार है। हालांकि, गैर-जाति समूहों के लिए आरक्षण दुर्लभ नहीं है। विकलांग व्यक्ति अधिनियम, 1995 विकलांग लोगों के लिए आरक्षण प्रदान करता है। विकलांग व्यक्ति के अधिकार अधिनियम, 2016 के बाद अब यह 4% है।

 

बिहार और गुजरात जैसे राज्यों ने भी महिलाओं के लिए आरक्षण की शुरुआत की है। 103वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2019 के पारित होने के साथ, आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के पास अब आरक्षण के लिए एक अलग आधार है। कुछ राज्यों में भूतपूर्व सैनिकों और खिलाड़ियों और/या उनके बच्चों के लिए भी आरक्षण है। हालांकि, अंतिम श्रेणी का संवैधानिक आधार अस्पष्ट रहा है।

 

राम सिंह बनाम  भारत संघ (2015) में, न्यायालय ने टिप्पणी की कि “'पिछड़ेपन की  परिभाषा' को जाति केंद्रित से हटाने की आवश्यकता है”। ओ.बी.सी. (OBC) श्रेणी में अनाथों को शामिल करने के पक्ष में अपने प्रस्ताव में एन.सी.बी.सी. (NCBC) द्वारा इस टिप्पणी पर भरोसा किया गया था। कोर्ट के समक्ष याचिका में भी इसी कथन  पर भरोसा किया गया है |  

 

मराठा आरक्षण (2021) पर हाल के फैसले में राम सिंह का हवाला दिया गया है, लेकिन इसने इस टिप्पणी का उल्लेख नहीं किया। हालांकि, जस्टिस भूषण ने अपने प्रमुख फैसले में टिप्पणी की थी कि आरक्षण एक अस्थायी 'बैसाखी' है जो एक जातिविहीन समाज की दृष्टि में बाधा उत्पन्न कर सकता है।

 

क्या अदालतें सही मंच हैं?

 सरकारों ने इन उपायों को पेश किया है, लेकिन  न्यायालयों के लिए किसी वर्ग को पिछड़े के रूप में मान्यता देना काफी दुर्लभ है। अनुच्छेद 15(4) और 16(4) की व्याख्या एक अधिकार के रूप में नहीं, बल्कि एक सक्षम प्रावधान के रूप में की गई है। गुलशन प्रकाश बनाम  हरियाणा राज्य (2010) में, सुप्रीम कोर्ट ने माना कि इन अनुच्छेदों के तहत प्रावधान करने की कोई बाध्यता नहीं है। यह कार्यपालिका और विधायिका की विवेकाधीन शक्ति है।

 

हालांकि,  यह पहले  के केसो के  आधार के बिना नहीं रहा है। नालसा बनाम भारत संघ (2014) में, कोर्ट ने ट्रांसजेंडर समूह  को 'पिछड़े वर्ग' के रूप में मान्यता दी और आदेश दिया कि उनके लिए आरक्षण लागू किया जाए। इस ऐतिहासिक मामले ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की दुर्दशा की व्याख्या की, हालांकि, इसने अदालत के लिए इन्हे पिछड़ा वर्ग घोषित करने के लिए कानूनी आधार को स्पष्ट नहीं किया। इसका अनजाने में सीधे तौर पर आरक्षण प्रदान करने के प्रभाव के रूप में पड़ा है, जिसकी आलोचना जाति के साथ के अंतर्भागों को पहचानने में विफल रहने के लिए की गई है।

 

परिवर्तन केंद्र बनाम भारत संघ (2015) में, न्यायालय ने कहा कि एसिड अटैक के  पीड़ितों को विकलांगता सूची में शामिल किया जाना चाहिए। यह आदेश भी स्पष्ट रूप से एक समूह को पिछड़े के रूप में पहचानने में न्यायपालिका के अधिकार के आधार को स्पष्ट नहीं करता है | एक साल बाद, विकलांग समूह के अधिकारों को नियंत्रित करने वाले कानून को वैसे भी बदल दिया गया, और एसिड अटैक के पीड़ितों को शामिल किया गया। यह ध्यान देने योग्य है कि इस दिशा ने, नालसा में एक के विपरीत, एक समूह को पिछड़े वर्ग के रूप में लेबल नहीं किया। इसके बजाय, इसने विकलांगता के मानदंड के आधार पर एक सूची में शामिल करने का निर्देश दिया, जो एसिड अटैक के पीड़ितों  को 'विकलांग व्यक्तियों' के रूप में आरक्षण का उपयोग करने में सक्षम बनाएगा। वर्तमान याचिका में  गेंदा राम बनाम एमसीडी (2010) का भी हवाला दिया गया है। यह मामला जनहित के मामलों में, जब तक कि विधायिका या कार्यपालिका अपना कानून/नीति तैयार नहीं कर सकती तब तक अंतरिम निर्देश जारी करने की अनुमति देता है। यह भारतीय सर्वोच्च न्यायालय के लिए असामान्य नहीं है (उदाहरण के लिए विशाखा v/s राजस्थान राज्य)। हालाँकि, न्यायालयों द्वारा कदम उठाने से पहले एक उच्च मानदंड होता है,और संसाधनों के आवंटन पर निर्णय लेने के विषय  पर इस शक्ति का सावधानी से प्रयोग किया जाता है।

 

महामारी की दूसरी लहर के दौरान, सुप्रीम कोर्ट की स्वत: सुनवाई के दौरान अनाथ और परित्यक्त( छोड़ दिए गए) बच्चों की दुर्दशा पर ध्यान दिया गया था। याचिकाकर्ता को न्यायालय को यह यकीन दिलाना होगा कि न केवल अनाथ पिछड़े हैं, बल्कि यह भी कि न्यायालय का हस्तक्षेप अपरिहार्य( एकदम जरुरी) और आवश्यक है।

 

This Piece is translated by Rajesh Ranjan & Priya Jain from Constitution Connect